शहीद वीर नारायण श्रम अन्न योजना में भ्रष्टाचार की आशंका,
श्रमिकों को नहीं मिल रहा भरपेट भोजन, स्वच्छता की कमी
मनेंद्रगढ़।
छत्तीसगढ़ शासन के श्रम विभाग द्वारा शहीद वीर नारायण श्रम अन्न योजना के तहत संगठित और असंगठित श्रमिकों को मात्र ₹5 में भोजन उपलब्ध कराने की योजना शुरू की गई थी। इस योजना का उद्देश्य था कि श्रमिक वर्ग को सस्ती दर पर भरपेट भोजन मिल सके, लेकिन हकीकत इससे अलग नजर आ रही है।

शहीद वीर नारायण श्रम अन्न योजना पलीता!
श्रमिकों को 5 रुपए में नहीं मिल रहा भरपेट भोजन — गंदगी, अव्यवस्था और लूट का अड्डा बनी योजना
मनेंद्रगढ़।
छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा श्रमिक वर्ग को सस्ती दर पर भरपेट भोजन उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू की गई शहीद वीर नारायण श्रम अन्न योजना भ्रष्टाचार और लापरवाही का शिकार होती नजर आ रही है। मात्र ₹5 में भोजन देने की इस महत्वाकांक्षी योजना की जमीनी हकीकत बेहद शर्मनाक है।
सरकार ने यह योजना श्रमिकों को सस्ती दर में स्वच्छ, पौष्टिक और भरपेट भोजन उपलब्ध कराने के लिए शुरू की थी, लेकिन अब यह योजना कागजों में ही भरपेट है, जमीन पर भूख और गंदगी का प्रतीक बन गई है।

मनेद्रगढ़ के सब्जी मंडी में संचालित शहीद वीर नारायण श्रम अन्न योजना के तहत ₹5 का जो भोजन देने का दावा किया जा रहा है, वह सिर्फ नाम के लिए है। भरपेट भोजन के लिए उन्हें अतिरिक्त पैसे देने पड़ते हैं। यानी जो योजना गरीब श्रमिकों के लिए राहत बननी थी, वह अब उनकी जेब पर बोझ बन चुकी है।
गंदगी और अव्यवस्था का आलम
भोजन स्थल पर स्वच्छता का नामोनिशान नहीं है। स्वच्छ जल की कोई व्यवस्था नहीं — ड्रम में जो पानी आता है, वही पीने को मजबूर हैं श्रमिक। जगह की भी भारी कमी है। न भोजन बनाने के लिए पर्याप्त स्थान है, न बैठने की व्यवस्था। ऊपर से किसी प्रकार की स्थायी छत तक नहीं, पन्नी लगाकर छाया बनाई गई है, जिसके नीचे श्रमिकों को भोजन कराया जाता है।

अधिकारी बन गए मूकदर्शक
श्रम विभाग के अधिकारी इस योजना को लेकर पूर्ण उदासीन रवैया अपनाए हुए हैं। बताया जा रहा है कि अधिकारी हफ्ते में सिर्फ एक दिन ही स्थल पर आते हैं, बाकी दिनों में योजना भगवान भरोसे चलती है।
समिति पर आरोप
योजना का संचालन करने वाली समिति या संस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। जानकारी के अनुसार बताया जा रहा है कि सरकार से मिलने वाले अनुदान के नाम पर बड़ी हेराफेरी की जा रही है। भोजन कराने वाले वास्तविक श्रमिकों की संख्या से 100 या उससे अधिक लोगों का फर्जी आंकड़ा दिखाकर अनुदान बढ़ा लिया जाता है।
योजना का मूल उद्देश्य था — “श्रमिकों को भरपूर, स्वच्छ और सस्ता भोजन मिले।”
लेकिन आज हालात यह हैं कि योजना भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुकी है। श्रमिक न तो भरपेट खा पा रहे हैं, न स्वच्छ वातावरण पा रहे हैं।
![]()
