वहां “मांझी” ने पहाड़ तोड़ा, यहां पूरा गांव बना ‘ब्रिज मैन’
*जब प्रशासन ने नहीं सुनी, खुद बना डाला पुल।*
मोहला-मानपुर (छत्तीसगढ़)।
एक तरफ तकनीकी रूप से दक्ष इंजीनियरों और प्रशासनिक अमले द्वारा बनाए गए सरकारी पुल कुछ ही महीनों में जर्जर हो रहे हैं, दूसरी ओर मानपुर ब्लॉक के दो छोटे आदिवासी गांवों ने देश को ऐसा उदाहरण दिया है जो ‘माउंटेन मैन’ दशरथ मांझी की कहानी को नए अंदाज में दोहराता है।

छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित और विकास से कोसों दूर आदिवासी बहुल मानपुर ब्लॉक के ग्राम खुरसेखुर्द और बेसली के ग्रामीणों ने वो कर दिखाया जो शायद सरकारें वर्षों में नहीं कर पातीं। वर्षों से पुल की मांग को अनसुना करने वाले शासन-प्रशासन को ठेंगा दिखाते हुए ग्रामीणों ने मिलकर खुद के संसाधनों से एक देसी पुल का निर्माण कर लिया। यह पुल अब न सिर्फ स्कूली बच्चों के लिए जीवनदायिनी साबित हो रहा है, बल्कि ग्रामीणों की दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा बन चुका है।
“मांझी ने पहाड़ तोड़ा था, यहां पूरा गांव मिलकर नाला पार कर गया।” — यही है आत्मनिर्भर भारत की असली तस्वीर।

अनसुनी मांग, टूटी उम्मीदें और फिर खड़ा हुआ हौसला
बरसों से प्रशासन से पुल की मांग की जाती रही, हर बार आश्वासन मिला, लेकिन जमीन पर कुछ नहीं बदला। स्कूली बच्चे जान जोखिम में डालकर बहते नाले को पार करते, बीमारों को अस्पताल तक पहुंचाना चुनौती बन चुका था, राशन-जलावन की ढुलाई का कोई साधन नहीं था।
आखिरकार दोनों गांवों के ग्रामीणों का सब्र जवाब दे गया। पंचायत स्तर पर बैठक कर तय किया गया कि अब शासन के भरोसे नहीं रहेंगे — पुल खुद बनाएंगे। खेती-बाड़ी, मजदूरी सब कुछ छोड़कर सभी घरों से लोग जुट गए और नाले के ऊपर बांस-बल्लियों व लकड़ी की सहायता से देसी तकनीक से पुल बनाना शुरू किया।

हौसले की मिसाल बना देसी पुल
ग्रामीणों ने देसी तरीके से बांसों को मजबूती से बांधकर उस पर बल्लियों की परत बनाई। आसपास की मिट्टी, पत्थरों से इसका आधार मजबूत किया गया। इस ‘जुगाड़ू ब्रिज’ की मजबूती देखकर इलाके के लोगों को भी आश्चर्य हो रहा है।
अब इस पुल से बच्चे स्कूल जा पा रहे हैं, महिलाएं राशन ला रही हैं और लोग इलाज के लिए अस्पताल तक पहुंच पा रहे हैं। जल्द ही पुल पर मुरूम डालकर छोटे वाहनों की आवाजाही भी शुरू हो जाएगी।

ब्रिज मैन नहीं, पूरा गांव बना ‘ब्रिज मिशन’
यह पुल सिर्फ लकड़ी और बांस का ढांचा नहीं है, यह ग्रामीणों की सामूहिक चेतना, आत्मनिर्भरता और संघर्ष की जीती-जागती मिसाल है। गांव वालों का कहना है कि अगर सरकार उनकी सुध नहीं लेती, तो वे खुद अपने दम पर अपने गांवों को संवारने को तैयार हैं।
सरकार के लिए सबक और संकेत
इस पूरे घटनाक्रम ने न केवल शासन-प्रशासन को कटघरे में खड़ा किया है, बल्कि यह भी जता दिया है कि आदिवासी समाज अब सिर्फ ‘विकास के वादों’ से नहीं, बल्कि व्यावहारिक विकास की उम्मीद रखता है। और जब यह उम्मीदें भी टूट जाएं, तो वह खुद उठकर रास्ता बना लेता है — ठीक वैसा ही जैसा दशरथ मांझी ने किया था।
अब क्या करें सरकार?
ग्रामीणों ने तो अपने स्तर पर पहल कर ली है, लेकिन अब जरूरत है कि शासन-प्रशासन इस कार्य को आगे बढ़ाकर स्थायी और पक्के पुल का निर्माण कराए, ताकि यह देसी पुल मात्र एक अस्थायी समाधान बनकर न रह जाए। साथ ही क्षेत्रीय विकास की योजनाओं में इन दूरस्थ गांवों को प्राथमिकता दी जाए।
“ये खबर सिर्फ एक पुल की नहीं है, ये खबर है हौसले की, उम्मीद की और उस चेतना की जो बताती है — अगर सरकारें सो जाएं, तो भी जनता जाग सकती है।”


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