“लाख ने दी लाखों की कमाई — ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आई नई जान”
“वन विभाग की पहल से पलाश पेड़ बने किस्मत बदलने वाले — 37 गांवों में फैली समृद्धि की लहर”
एमसीबी/06 नवम्बर 2025/
छत्तीसगढ़ के खेत-खलिहानों में खड़े पलाश के पेड़ अब सिर्फ हरियाली का प्रतीक नहीं, बल्कि ग्रामीण समृद्धि के नए सूत्रधार बन चुके हैं।
वन मंडलाधिकारी मनीष कश्यप ने बताया कि वनमंडल मनेंद्रगढ़ की अभिनव पहल “लाख पालन अभियान” ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नई जान फूंक दी है। अब तक 37 गाँवों के लगभग 400 किसान इस अभियान से जुड़ चुके हैं और हजारों पलाश के पेड़ों पर लाख की खेती से नई उम्मीदें पनप रही हैं।

पलाश पेड़ों से नई आजीविका का रास्ता
मनीष कश्यप ने बताया कि पलाश के पेड़ रंगीनी लाख पालन के लिए अत्यंत उपयुक्त होते हैं। अब तक इन पेड़ों का कोई व्यावसायिक उपयोग नहीं किया जा रहा था, लेकिन वैज्ञानिक पद्धति से लाख पालन कर किसान खेती के साथ अतिरिक्त आय अर्जित कर सकते हैं।
इससे न केवल किसानों की आय बढ़ेगी, बल्कि ग्रामीण पलायन पर भी रोक लगेगी, क्योंकि कृषि के अलावा ग्रामीणों के पास आय के सीमित साधन ही उपलब्ध हैं।

लाख पालन से बदल रही ग्रामीण अर्थव्यवस्था
मनेंद्रगढ़ क्षेत्र में पलाश पेड़ों की भरमार है। पूर्व में यहाँ लाख पालन होता था, लेकिन वैज्ञानिक तरीकों की कमी के कारण यह परंपरा धीरे-धीरे समाप्त हो गई थी।
वन विभाग के मार्गदर्शन में अक्टूबर-नवंबर 2023-24 में ग्राम भौता, नारायणपुर, छिपछिपी और बुंदेली के 34 कृषकों को 2.54 क्विंटल लाख बीहन वितरित किए गए।
इन बीजों का 276 पेड़ों में सफल संचरण कराया गया। इसके बाद जून-जुलाई 2024-25 में 4 कृषकों द्वारा 80 पेड़ों में 0.74 क्विंटल बीहन लगाया गया।
हर गांव में फैल रही लाख की लहर
अभियान की सफलता को देखते हुए अक्टूबर 2024-25 में 5 वनोपज सहकारी समितियों के माध्यम से 9 ग्रामों के 126 कृषकों ने 3117 पलाश पेड़ों में लाख पालन किया।
जुलाई 2025 में यह संख्या दोगुनी होकर 10 समितियों के 27 ग्रामों के 205 कृषकों तक पहुंच गई, जिन्होंने 2037 पेड़ों में 25.50 क्विंटल बीहन लाख का संचरण किया।
इसमें से 20.45 क्विंटल लाख स्थानीय किसानों द्वारा उत्पादित की गई थी, जबकि शेष बलरामपुर से लाई गई।
अक्टूबर 2025 तक यह अभियान और व्यापक रूप ले चुका है — अब 37 गांवों के 400 किसानों ने 6 हजार पेड़ों में 60 क्विंटल बीहन लाख का संचरण किया है, जो पूरी तरह स्थानीय उत्पादन है।

मनेंद्रगढ़ बन सकता है छत्तीसगढ़ का ‘लाख हब’
वनमंडल का लक्ष्य हर वर्ष उत्पादन को तीन गुना बढ़ाना है। इससे आगामी वर्षों में यह पहल पूरा जिला-स्तरीय अभियान बन जाएगी।
लाख पालन की सबसे बड़ी चुनौती बीहन लाख की उपलब्धता होती है, लेकिन अब मनेंद्रगढ़ इस दिशा में आत्मनिर्भर हो चुका है।
फिलहाल देश में झारखंड पहला और छत्तीसगढ़ दूसरा स्थान रखता है, परंतु छत्तीसगढ़ में मनेंद्रगढ़ जिला लाख उत्पादन में अग्रणी बनकर उभरा है।
लाख पालन से बढ़ा किसानों का मुनाफा
वन विभाग के अनुसार, बीहन लाख की मात्रा के मुकाबले उत्पादन 2.5 गुना तक होता है।
इससे किसानों को लगभग डेढ़ गुना शुद्ध लाभ मिलता है। कई किसान 30 से 40 हजार रुपये तक की अतिरिक्त आमदनी अर्जित कर रहे हैं।
सफलता की मिसाल – केस स्टडी
ग्राम छिपछिपी के कृषक सर्वजीत सिंह ने अक्टूबर-नवंबर 2023 में 40 किलो बीहन 45 पेड़ों में लगाया।
उनकी लागत थी 10,000 रुपये। अगले वर्ष उन्होंने 150 किलो बीहन लाख 37,500 रुपये में और जुलाई 2025 में 125 किलो लाख 31,250 रुपये में बेचा।
दो वर्षों में उन्होंने 58,000 रुपये का शुद्ध लाभ अर्जित किया।
इसी तरह ग्राम नारायणपुर के किसान उदयनारायण ने 2024 में 60 किलो बीहन 70 वृक्षों में 15,000 रुपये की लागत से लगाया।
उन्होंने जुलाई 2025 में 150 किलो बीहन लाख 37,500 रुपये में विक्रय किया और एक वर्ष में 22,500 रुपये का लाभ कमाया।
वनमंडल मनेंद्रगढ़ की यह पहल ग्रामीण अर्थव्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव ला रही है।
पलाश पेड़, जो पहले बेकार समझे जाते थे, अब किसानों के आर्थिक संबल बन गए हैं।
मनेंद्रगढ़ जिले का यह मॉडल न केवल आत्मनिर्भर भारत की दिशा में कदम है, बल्कि आने वाले समय में छत्तीसगढ़ को लाख उत्पादन का केंद्र बनाने की दिशा में भी एक बड़ी छलांग है।
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हर गांव में फैल रही लाख की लहर