महीनों बाद हुआ एग्रीमेंट – एक दुकान का अब तक अधर में
एमसीबी जिले के आबकारी विभाग में किरायानामा गोलमाल!
महीनों बाद हुआ एग्रीमेंट – एक दुकान का अब तक अधर में

मनेंद्रगढ़।
एमसीबी जिले के आबकारी विभाग में मदिरा दुकानों के किरायानामा (एग्रीमेंट) को लेकर बड़ा गोलमाल सामने आया है। जिले में देशी एवं विदेशी मदिरा की कुल 18 दुकानों का संचालन हो रहा है। इनमें से 15 दुकानों का किरायानामा 50 रुपए के स्टांप पेपर पर किया गया है, जबकि दो दुकानें सरकारी भवनों (जनकपुर एवं खोंगापानी विदेशी मदिरा दुकान) में संचालित हैं। हैरानी की बात यह है कि मनेंद्रगढ़ विदेशी मदिरा दुकान का एग्रीमेंट अब तक अधर में लटका हुआ है।
अप्रैल से किराया, मगर एग्रीमेंट महीनों बाद!
जांच में यह तथ्य सामने आया है कि किरायानामा में स्पष्ट उल्लेख है कि किराए की राशि 1 अप्रैल से लागू होगी। लेकिन विभाग द्वारा इन करारनामों का नोटरी व सत्यापन जून, जुलाई, अगस्त और सितंबर में किया गया है। सवाल यह उठता है कि जब किराए की वसूली अप्रैल से तय थी तो करारनामे का सत्यापन महीनों बाद क्यों और किस दबाव में किया गया?
नियमों की धज्जियां
कानूनी प्रावधानों के अनुसार किसी भी प्रकार का शासकीय एग्रीमेंट या किरायानामा किराया प्रारंभ होने के दिन या उससे पहले ही किया जाना अनिवार्य है। नियमों की खुलेआम अनदेखी करते हुए एग्रीमेंट महीनों बाद तैयार कराया गया। इससे न केवल प्रशासनिक लापरवाही उजागर होती है, बल्कि यह भी संकेत मिलता है कि विभाग में मनमानी और मिलीभगत का खेल चल रहा है।
एक दुकान का एग्रीमेंट अधर में
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मनेंद्रगढ़ विदेशी मदिरा दुकान का एग्रीमेंट अब तक पूरा ही नहीं हो सका है। इससे यह सवाल खड़ा होता है कि बिना एग्रीमेंट के अब तक दुकान किस आधार पर संचालित हो रही है?
जिम्मेदारी किसकी?
बताया जा रहा है कि इन करारनामों में दूसरा पक्षकार छत्तीसगढ़ स्टेट मार्केटिंग कॉरपोरेशन लिमिटेड रायपुर है, जिसका प्रतिनिधित्व जिला प्रबंधक, सीएसएमसीएल एमसीबी करते हैं। ऐसे में यह स्पष्ट है कि या तो विभाग की लापरवाही है, या फिर जानबूझकर लापरवाही किया जा रहा है।
जनता में सवाल
इस मामले ने अब जिले में पारदर्शिता और शुचिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं और क्या मनेंद्रगढ़ की दुकान बिना एग्रीमेंट के संचालित कराना विभागीय भ्रष्टाचार का उदाहरण नहीं है?
जिला आबकारी अधिकारी की भूमिका संदिग्ध!
सबसे अहम सवाल यह है कि क्या इस मामले में जिला आबकारी अधिकारी की कोई भूमिका नहीं है? यदि नहीं है, तो फिर उन्होंने जिला प्रबंधक, सीएसएमसीएल द्वारा इस तरह के नियम विरुद्ध एग्रीमेंट किए जाने पर आपत्ति क्यों नहीं जताई? क्या अधिकारी पूरे घटनाक्रम से अनजान बने रहे या फिर जानबूझकर चुप्पी साध ली?
क्या बिना एग्रीमेंट दुकान संचालन विभागीय भ्रष्टाचार का खुला नमूना नहीं है?
आखिर जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
एमसीबी जिले का यह मामला साफ तौर पर दिखाता है कि नियम-कानून सिर्फ कागजों तक सीमित हैं, और जमीन पर विभागीय अधिकारी अपनी मर्जी से काम कर रहे हैं। यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं जानबूझकर किया गया अवैधानिक कृत्य है जिसकी उच्चस्तरीय जांच जरूरी है।
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