नियम ताक पर, जनता लाचार: मुर्गी फार्म की दुर्गन्ध से हाहाकार
शिकायतों के बाद भी सन्नाटा: बदबू के जाल में फंसा हाईवे-43
मनेंद्रगढ़।
विकास के दावों की पोल खोलती एक भयावह हकीकत इन दिनों नेशनल हाईवे-43 पर देखने को मिल रही है। कलेक्टर कार्यालय से महज दो किलोमीटर दूर स्थित एक मुर्गी फार्म ने पूरे इलाके को बदबू और प्रदूषण के ऐसे जाल में जकड़ लिया है कि लोगों का जीना दूभर हो गया है। हालत इतने खराब हैं कि यह इलाका अब आमजन के लिए “गैस चैंबर” से कम नहीं रह गया है।
सुबह-शाम इस मार्ग से गुजरने वाले राहगीरों को नाक बंद कर, सांस रोककर निकलना पड़ रहा है। खासकर दोपहिया वाहन चालकों के लिए यह स्थिति जानलेवा साबित हो सकती है—अचानक उठने वाली सड़ी दुर्गन्ध से संतुलन बिगड़ने तक की नौबत आ रही है।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह समस्या नई नहीं, बल्कि महीनों से जारी है। शिकायतें, ज्ञापन, सोशल मीडिया—हर मंच पर आवाज उठाई गई, लेकिन प्रशासन हर बार “औपचारिक कार्रवाई” का ढोंग कर मामले को ठंडे बस्ते में डाल देता है। कुछ दिन राहत, फिर वही बदबू, वही परेशानी—यह सिलसिला अब आम हो चुका है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह पूरा मामला प्रशासनिक मुख्यालय के बेहद करीब है, इसके बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों की “चुप्पी” कई सवाल खड़े कर रही है। क्या नियम सिर्फ कागजों तक सीमित हैं? क्या पर्यावरण और स्वास्थ्य मानकों की खुलेआम अनदेखी हो रही है? या फिर किसी प्रभावशाली व्यक्ति के दबाव में कार्रवाई को जानबूझकर टाला जा रहा है?
स्थिति तब और भयावह हो जाती है जब फार्म से निकलने वाले अपशिष्ट का अंबार बढ़ जाता है। उस वक्त दुर्गन्ध कई गुना ज्यादा फैलकर आसपास के रहवासियों के लिए जीना मुश्किल कर देती है। यह केवल असुविधा नहीं, बल्कि सीधे तौर पर लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है।

इस बीच एक मासूम बच्ची की पीड़ा ने पूरे मामले को झकझोर दिया है। बस के इंतजार में रोड में रोड पर खड़ी बच्ची ने कहा
“यहां खड़े रहना मुश्किल है, इतनी बदबू आती है कि सांस लेना भी मुश्किल हो जाता है। इस मुर्गी फार्म को यहां से हटाना चाहिए।”
यह मासूम आवाज प्रशासन की संवेदनहीनता पर सीधा प्रहार है।

विशेषज्ञ भी चेतावनी दे रहे हैं कि इस तरह की दुर्गन्ध केवल परेशानी नहीं, बल्कि गंभीर बीमारियों को जन्म दे सकती है—सांस संबंधी रोग, एलर्जी और संक्रमण का खतरा लगातार बढ़ रहा है।
अब बड़ा सवाल—
क्या कानून सबके लिए बराबर है या रसूखदारों के लिए अलग नियम हैं?
क्या आम जनता की तकलीफ की कोई कीमत नहीं?
और कब तक लोग इस “जहरीली हवा” में जीने को मजबूर रहेंगे?
जनता की साफ मांग है—या तो इस मुर्गी फार्म को सख्त मानकों के तहत तत्काल नियंत्रित किया जाए, या फिर इसे आबादी और हाईवे से दूर स्थानांतरित किया जाए।
अब निगाहें प्रशासन पर टिकी हैं—
क्या इस बार भी दिखावे की कार्रवाई होगी, या सच में इस सड़ांध पर लगाम लगेगी?
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