*“आँखें भले बंद हो जाएँ… पर किसी की दुनिया रोशन कर जाएँ”_ नीलम दुबे*
*नेत्रदान का महत्व बताया – मरणोपरांत नेत्रदान की घोषणा*
मनेद्रगढ़।
राष्ट्रीय अंधत्व निवारण समिति के तत्वावधान में चल रहे नेत्रदान पखवाड़ा के तहत रविवार को सरस्वती शिशु मंदिर के खेल प्रांगण में विशेष जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम का आयोजन पतंजलि योग समिति जिला इकाई के सौजन्य से हुआ, जिसका नेतृत्व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के सहायक नेत्राधिकारी आर. डी. दीवान ने किया।

कार्यक्रम में उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए सहायक नेत्राधिकारी श्री दीवान ने नेत्रदान के महत्व पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि नेत्रदान एक महान कार्य है, जिससे किसी नेत्रहीन को दृष्टि मिल सकती है। उन्होंने कहा कि मरणोपरांत 6 से 8 घंटे की अवधि में नेत्रदान संभव होता है और इसके तहत मुख्यतः कार्निया प्रत्यारोपण किया जाता है।
श्री दीवान ने लोगों को नेत्रों की सुरक्षा और उनकी देखभाल से जुड़ी आवश्यक सावधानियों की भी जानकारी दी। उन्होंने कहा कि समय-समय पर आंखों की जांच कराना, संतुलित आहार लेना और नेत्रों को संक्रमण से बचाना बेहद जरूरी है।
कार्यक्रम में उपस्थित जिला अंधत्व निवारण समिति के पदाधिकारियों व सामाजिक कार्यकर्ताओं में सतीश उपाध्याय, बलवीर कौर, भैरव केसरवानी, जगदंबा अग्रवाल, अर्चना सेजपाल, श्रीमती इरा कर, रामसेवक विश्वकर्मा, विवेक कुमार तिवारी, विष्णु प्रसाद कोरी, कैलाश दुबे, अनीता फरमानिया, रूपा पोद्दार, राकेश अग्रवाल, नीलम दुबे और कविता मंगतानी शामिल हुए। सभी ने सहायक नेत्राधिकारी द्वारा दी गई जानकारी को उपयोगी व प्रेरणादायक बताया।
इस अवसर पर विशेष रूप से शिक्षिका नीलम दुबे ने घोषणा की कि वे मरणोपरांत अपना नेत्रदान करेंगी। उनकी इस पहल का उपस्थित सभी लोगों ने तालियों की गड़गड़ाहट से स्वागत किया।
कार्यक्रम का संचालन पतंजलि योग समिति के जिला प्रभारी ने किया और अंत में सभी को नेत्रदान के महत्व को समाज तक पहुँचाने का संकल्प दिलाया गया।
नेत्रदान – किसी के अंधकारमय जीवन में रोशनी लाने का सबसे बड़ा दान है।
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